विरासत की खातिर(सम्पादकीय)
विरासत की खातिर

(सम्पादकीय)


 क्लू टाइम्स, सुरेन्द्र कुमार गुप्ता 9837117141

विरासत की खातिर

चंडीगढ़ में रिहाइशी इलाकों के स्वरूप में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वह दूरगामी महत्त्व का है। 

यह न सिर्फ चंडीगढ़ को एक विरासत के रूप में बचाने की फिक्र है, बल्कि एक तरह से विकास के नाम पर चलने वाली उन गतिविधियों पर भी टिप्पणी है, जिसकी वजह से कोई शहर आम जनजीवन से लेकर पर्यावरण तक के लिहाज से बदइंतजामी का शिकार हो जाता है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ शहर के फेज एक में एकल आवासीय इकाइयों को मंजिल आधारित अपार्टमेंट में बदलने पर रोक लगा दी है। अब इस इलाके में एक समान अधिकतम ऊंचाई के साथ मंजिलों की संख्या तीन तक सीमित रहेगी। पिछले कुछ दशकों से शहरों में विकास के नाम पर जिस तरह की बेलगाम गतिविधियां चल रही हैं, उसके मद्देनजर इस फैसले को दरअसल देश के पहले नियोजित शहर चंडीगढ़ की विरासत को बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम कहा जा सकता है। अदालत ने भी इसकी अहमियत का जिक्र करते हुए कहा कि यह रोक चंडीगढ़ की विरासत की स्थिति के साथ-साथ स्थिरता के मद्देनजर जरूरी है; सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक ‘उचित संतुलन’ बनाने की भी आवश्यकता है।

यह जगजाहिर तथ्य है कि देश भर के शहर-महानगर व्यवस्थागत स्तर पर जिस तरह की समस्याओं से दो-चार होते जाते हैं, उसका मुख्य कारण अनियोजित विकास होता है। चंडीगढ़ को इसीलिए अलग करके देखा जाता रहा है कि इस शहर को जिस स्वरूप में निर्मित किया गया था, उसमें न सिर्फ रिहाइश के स्तर पर आम लोगों को एक बेहतर जगह मिल सकी, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी नियोजित शहरीकरण का एक आदर्श उदाहरण रहा है।

फ्रांसीसी वास्तुकार ली कार्बूजिए ने सालों की मेहनत के बाद चंडीगढ़ शहर की संरचना का निर्माण किया था। उन्हें भीड़भाड़ वाले शहरों में बेहतर स्थितियां और जरूरत के मुताबिक ढांचा तैयार कराने के प्रति समर्पित माना जाता था। उन्होंने चंडीगढ़ में जिस स्वरूप में इमारतों का निर्माण कराया, वे आमतौर पर एक अलग संदेश देती हैं। मगर अफसोस की बात यह है कि वक्त के साथ इन इमारतों में भी सुविधा के मुताबिक कई तरह के बदलाव किए गए। जाहिर है, इस तरह के बदलाव केवल सीमित असर नहीं डाल रहे थे, बल्कि विस्तृत होकर शहर के ढांचे पर भी प्रभाव डालने वाले थे। इसी क्रम में सन 2001 में एक नियम के तहत चंडीगढ़ में आवासीय भूखंडों को अपार्टमेंट के रूप में निर्माण या उपयोग करने की इजाजत दे दी गई थी।

हालांकि इसके बाद नागरिक समूहों ने चंडीगढ़ प्रशासन के खिलाफ इस मसले पर सार्वजनिक विरोध जाहिर किया था। विरोध के पीछे दलील यह थी कि ढांचे में बदलाव की इस तरह की कोशिशें शहर के चरित्र को पूरी तरह बदल देंगी और मौजूदा बुनियादी ढांचे और सुविधाओं को खत्म कर देंगी। इसके बाद इन नियमों को अक्तूबर 2007 में रद्द कर दिया गया। इसके बावजूद कई स्तर पर नियमों को दरकिनार कर आवासीय इकाइयों को मनमाने निर्माण के लिए बेचा जाता रहा।

सवाल है कि जिस शहर को एक व्यापक दृष्टिकोण और मेहनत के बाद बनाया गया था, उसके स्वरूप को संरक्षित करने के प्रति सरकार या संबंधित महकमों ने अपनी ओर से सजगता दिखाने के बजाय उसके प्रति अपनी आंखें क्यों मूंदे रखीं! ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसला एक विरासती शहर के रूप में चंडीगढ़ के बुनियादी स्वरूप को बचाने के लिहाज से काफी अहम है। खासतौर पर ऐसे समय में जब इसी पहलू की अनदेखी की वजह से जोशीमठ या अन्य धरोहरों के सामने अस्तित्व बचाने तक की चुनौती खड़ी हो रही है।