भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड क्या है? कतिपय संशोधनों के बाद अब यह कितना प्रभावशाली है?

क्लू टाइम्स, सुरेन्द्र कुमार गुप्ता। 9837117141भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड क्या है? कतिपय संशोधनों के बाद अब यह कितना प्रभावशाली है?

भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया) विनियम, 2017 के साथ पठित दिवाला और दिवालियापन कोड, 2016 विलायक कॉर्पोरेट व्यक्ति के स्वैच्छिक परिसमापन के लिए तंत्र प्रदान करता है।

केंद्र सरकार के मातहत कार्य करने वाला भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड ने भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया) विनियम, 2017 में संशोधन किया है, ताकि इसे और प्रभावी और व्यवस्था के अनुकूल बनाया जा सके। अपनी इसी रणनीति के तहत भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड ने गत 5 अप्रैल, 2022 को भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया) (संशोधन) विनियम, 2022 (संशोधन विनियम) को अधिसूचित किया है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया) विनियम, 2017 के साथ पठित दिवाला और दिवालियापन कोड, 2016 विलायक कॉर्पोरेट व्यक्ति के स्वैच्छिक परिसमापन के लिए तंत्र प्रदान करता है। हालांकि सरकार के संज्ञान में ऐसा आया है कि स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया को पूरा करने में अत्यधिक विलंब होता रहा है। यद्यपि सामान्य तौर पर प्रक्रिया में लेनदारों के शून्य या नगण्य दावे शामिल किए जाते हैं। कम संपत्ति, यदि कोई हो, वसूल की जाती है और कुछ ही मुकदमे, यदि कोई हो, का निष्कर्ष निकाला जाता है। इस तरह के विलंब को कम करने और फर्मों के लिए त्वरित रूप से बाहर निकलने को सुनिश्चित करने के लिए, संशोधन विनियम प्रक्रिया के दौरान की गई कुछ निर्धारित गतिविधियों के लिए समय-सीमा को निम्नानुसार संशोधित करते हैं-

पहला, परिसमापक दावों की प्राप्ति की अंतिम तिथि से पंद्रह दिनों के भीतर, पहले से निर्धारित पैंतालीस दिनों के विरुद्ध, हितधारकों की सूची तैयार करेगा, जहां दावों की प्राप्ति की अंतिम तिथि तक लेनदारों से कोई दावा प्राप्त नहीं किया गया है। 

दूसरा, परिसमापक राशि की प्राप्ति से तीस दिनों के भीतर, पहले से निर्धारित छह महीने के विरूद्ध), राशि की प्राप्ति से आय को हितधारकों को वितरित करेगा।

तीसरा, यह भी प्रावधान किया गया है कि परिसमापक, परिसमापन शुरू होने की तिथि से दो सौ सत्तर दिनों, जहां लेनदारों ने धारा 59(3)(सी) या विनियमन 3(1)(सी) के तहत प्रस्ताव को मंजूरी दी है और अन्य सभी मामलों, सभी स्थितियों में पहले से निर्धारित 12 महीनों के विरूद्ध, में परिसमापन शुरू होने की तारीख से नब्बे दिन के भीतर कॉर्पोरेट व्यक्ति की परिसमापन प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास करेगा।

अंततः, स्वैच्छिक परिसमापन प्रक्रिया के दौरान परिसमापक द्वारा की गई कार्रवाइयों का सारांश प्रदान करने के लिए, संशोधन विनियम एक अनुपालन प्रमाण पत्र निर्दिष्ट करते हैं जिसकी आवश्यकता परिसमापक द्वारा न्यायनिर्णयन प्राधिकरण को धारा 59 (7) के तहत आवेदन के साथ जमा करने के समय पड़ती है। यह निर्णायक प्राधिकरण को विलयन आवेदनों पर शीघ्रता से निर्णय लेने में सुविधा प्रदान करेगा।संशोधन विनियम 05 अप्रैल, 2022 से प्रभावी हैं। ये www.mca.gov.in और www.ibbi.gov.in पर उपलब्ध हैं। यह भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट है जिसे आईबीबीआई द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है और इसे राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) द्वारा होस्ट किया गया है।

# भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड ने भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (प्री-पैकेज्ड दिवाला निपटान प्रक्रिया) नियमन 2021 को पिछले साल ही कर दिया था अधिसूचित

गौरतलब है कि भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड ने भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (प्री-पैकेज्ड दिवाला निपटान प्रक्रिया) नियमन 2021 पिछले साल ही अधिसूचित कर दिया गया था। तब दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2021, चार अप्रैल 2021 से प्रभावी हो गया था। इसके तहत छोटे और मझोले इकाई के तहत आने वाले कर्जदार कारोबारियों को प्री-पैकेज्ड दिवाला निपटान प्रक्रिया (पीपीआईआरपी) की सुविधा मिल गई थी। इस संबंध में भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड ने भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (प्री-पैकेज्ड दिवाला निपटान प्रक्रिया) नियमन 2021 (पीपीआईआरपी) अधिसूचित कर दिया गया था जो तभी से प्रभावी हो गया है।

मसलन, पीपीआईआरपी नियमन में उन सभी बातों का विस्तार पूर्वक विवरण दिया गया है, जिसमें संबंधित पक्षों को फॉर्म और दूसरी जरूरतों को पूरा करने का विवरण दिया गया है। यह निम्नलिखित चीजें मुहैया कराता है:

पहला, विवाद निपटान पेशेवर के रुप में काम करने के लिए पात्रता और नियुक्ति की शर्तें। 

दूसरा, पंजीकृत वैल्युअर्स और अन्य पेशेवरों की पात्रता। 

तीसरा, अधिकृत प्रतिनिधि की पहचान और चयन। 

चतुर्थ, सार्वजनिक घोषणा और संबंधित पक्ष के दावे। 

पंचम, मसौदे की जानकारी। 

छठा, कर्जदाता और कर्जदाता समिति की बैठक। 

सातवां, विवाद निपटान योजना का आमंत्रण। 

आठवां, मूल विवाद निपटान और सबसे अच्छे विवाद निपटान के बीच प्रतिस्पर्धा। 

नवम, विवदान निपटान का मूल्यांकन और चर्चा। 

दशम, कॉरपोरेट कर्जदार के साथ विवाद निपटान पेशेवरों के साथ प्रबंधन। ग्यारह, पीपीआईआरपी का खत्म होना। पीपीआईआरपी नियमन तभी से लागू हो गया है। जो कि www.mca.gov.in और www.ibbi.gov.in. पर उपलब्ध है।

# आईबीबीआई ने भारतीय दिवाला एवं दिवालियापन बोर्ड (नियम जारी करने के लिए प्रक्रिया) नियमन, 2018 किए गए थे अधिसूचित

बता दें कि आईबीबीआई ने भारतीय दिवाला एवं दिवालियापन बोर्ड (नियम जारी करने के लिए प्रक्रिया) नियमन, 2018 अधिसूचित किए गए थे। दरअसल, दिवाला एवं दिवालियापन संहिता, 2016 एक आधुनिक आर्थिक कानून है। इस संहिता की धारा 240 के तहत भारतीय दिवाला एवं दिवालियापन बोर्ड (आईबीबीआई) को नियमन बनाने का अधिकार दिया गया है। 

हालांकि, इसके तहत इन शर्तों का पालन करना होगा : (क) संहिता के प्रावधानों का कार्यान्‍वयन करना होगा, (ख) ये संहिता और इसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के अनुरूप होंगे, (ग) इन्‍हें सरकारी राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना के जरिए बनाना होगा। इन्‍हें जल्‍द से जल्‍द संसद के हर सदन में 30 दिनों के लिए प्रस्‍तुत करना होगा।

संहिता के तहत विभिन्‍न प्रक्रियाओं के लिए अधीनस्‍थ कानूनों के महत्‍व को ध्‍यान में रखते हुए यह आवश्‍यक है कि आईबीबीआई में एक सुव्‍यवस्थित एवं सुदृढ़ व्‍यवस्‍था हो जिसमें नियम-कायदे बनाने के लिए विभिन्‍न हितधारकों के साथ कारगर संवाद करना भी शामिल है। संहिता की धारा 196 (1) के तहत आईबीबीआई के लिए यह आवश्‍यक है कि वह नियमन की अधिसूचना से पहले नियम-कायदे जारी करने के लिए आवश्‍यक व्‍यवस्‍था को निर्दिष्‍ट करे, जिसमें सार्वजनिक परामर्श प्रक्रियाओं का संचालन करना भी शामिल है। 

इस अवधारणा और वैधानिक आवश्‍यकता के अनुरूप आईबीबीआई ने भारतीय दिवाला एवं दिवालियापन बोर्ड (नियम जारी करने के लिए प्रक्रिया) नियमन, 2018 अधिसूचित किए हैं, ताकि नियम-कायदे बनाने और आम जनता से सुझाव मांगने की प्रक्रिया का संचालन किया जा सके।

नियम जारी करने की प्रक्रिया में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी नियमन को बनाने अथवा उसमें संशोधन करने के लिए आईबीबीआई को संचालन बोर्ड की मंजूरी से अपनी वेबसाइट पर निम्‍नलिखित को अपलोड करके उन पर आम जनता से सुझाव मांगने होंगे:- पहला, प्रस्‍तावित नियम-कायदों के मसौदे पर। दूसरा, संहिता के उस विशिष्‍ट प्रावधान पर, जिसके तहत बोर्ड ने नियम-कायदे प्रस्‍तावित किए हैं। 

तीसरा, उस समस्‍या के बारे में, जिसे प्रस्‍तावित नियमन के तहत सुलझाया जाना है। चतुर्थ, प्रस्‍तावित नियम-कायदों के आर्थिक विश्‍लेषण पर। पंचम, अंतर्राष्‍ट्रीय मानक तय करने वाली एजेंसियों द्वारा अनुशंसित मानकों से जुड़े वक्‍तव्‍य के साथ-साथ प्रस्‍तावित नियमन के लिए प्रासंगिक मानी जाने वाली अंतर्राष्‍ट्रीय सर्वोत्‍तम प्रथाओं के बारे में। छठा, प्रस्‍तावित नियम-कायदों के कार्यान्‍वयन के तरीके के बारे में।सातवां, आम जनता से सुझाव मांगने के तौर-तरीकों, प्रक्रिया तथा तय समय सीमा के बारे में।

बताया जाता है कि आईबीबीआई आम जनता से सुझाव आमंत्रित करने के लिए उन्‍हें कम से कम 21 दिन का समय देगा। यह आम जनता से प्राप्‍त सुझावों पर गौर करेगा और इन सुझावों पर अपनी सामान्‍य प्रक्रिया के साथ उन्‍हें अपनी वेबसाइट पर अपलोड करेगा। नियम-कायदों की अधिसूचना जारी करने की तिथि से पहले ही यह काम आईबीबीआई को पूरा करना होगा। 

यदि संचालन बोर्ड प्रस्‍तावित नियमनों के बिल्‍कुल विपरीत रूप में इन्‍हें मंजूरी देने का निर्णय लेता है, तो उसे नियमन जारी करने से जुड़ी पूरी प्रक्रिया दोहरानी होगी। संचालन बोर्ड से मंजूरी मिलने के बाद इन नियमनों को तुरंत अधिसूचित करना होगा और आम तौर पर अधिसूचना जारी होने की तिथि के 30 दिनों के बाद उन्‍हें लागू करने होगा, बशर्ते कि इनके कार्यान्‍वयन के लिए अलग से कोई तिथि निर्दिष्‍ट न की गई हो।

हालांकि, यदि आईबीबीआई को ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ नियम-कायदों को बनाना जरूरी है अथवा मौजूदा नियमनों में संशोधन अत्‍यंत आवश्‍यक है, तो वह सलाह-मशविरा की उपर्युक्‍त प्रक्रिया को अपनाए बगैर ही संचालन बोर्ड की मंजूरी से संबंधित नियम-कायदे बना सकता है अथवा मौजूदा नियमनों में संशोधन कर सकता है। बता दें कि जारी किए गए नियमन 22 अक्‍टूबर, 2018 से ही प्रभावी हो चुके हैं। ये www.mca.gov.in और www.ibbi.gov.in पर उपलब्‍ध है।

# भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड की स्थापना 1 अक्टूबर, 2016 को की गई थी दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (कोड) के तहत 

बता दें कि भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड की स्थापना 1 अक्टूबर, 2016 को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (कोड) के तहत की गई थी। यह संहिता के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार पारिस्थितिकी तंत्र का एक प्रमुख स्तंभ है जो ऐसे व्यक्तियों की संपत्ति के मूल्य को अधिकतम करने के लिए समयबद्ध तरीके से कॉर्पोरेट व्यक्तियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों के पुनर्गठन और दिवाला समाधान से संबंधित कानूनों को समेकित और संशोधित करता है। उद्यमिता को बढ़ावा देना, ऋण की उपलब्धता और सभी हितधारकों के हितों को संतुलित करना ही इसका मुख्य उद्देश्य है।

देखा जाए तो यह एक अनूठा नियामक है जो पेशे के साथ-साथ प्रक्रियाओं को भी नियंत्रित करता है। यह दिवाला पेशेवरों, दिवाला व्यावसायिक एजेंसियों, दिवाला व्यावसायिक संस्थाओं और सूचना उपयोगिताओं पर नियामक निरीक्षण करता है। यह संहिता के तहत प्रक्रियाओं के लिए नियम लिखता है और लागू करता है, अर्थात् कॉर्पोरेट दिवाला समाधान, कॉर्पोरेट परिसमापन, व्यक्तिगत दिवाला समाधान और व्यक्तिगत दिवालियापन। इसे बीते कुछ वर्षों से ही संहिता के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए दिवाला पेशेवरों, दिवाला पेशेवर एजेंसियों और सूचना उपयोगिताओं और अन्य संस्थानों के कामकाज और प्रथाओं के विकास को बढ़ावा देने और विनियमित करने का काम सौंपा गया है। इसे देश में मूल्यांकनकर्ताओं के पेशे के विनियमन और विकास के लिए कंपनियों (पंजीकृत मूल्यांकक और मूल्यांकन नियम), 2017 के तहत 'प्राधिकरण' के रूप में भी नामित किया गया है।

बताते चलें कि भारतीय दिवाला और शोधन बोर्ड एवं भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड यानी आईबीबीआई में एक गवर्निंग बोर्ड है, जिसकी बोर्ड बैठक सुनिश्चित अंतराल पर या आवश्यकता के अनुरूप होती है। इसकी संगठनात्मक संरचना, अनुशासनात्मक समिति, सलाहकार समितियां, तकनीकी समिति, अधिकारी गण और आंतरिक शिकायत समिति बोर्ड को प्राप्त शक्तियां और कार्य के अंतर्गत अपने कार्यों का निष्पादन करते हैं।

बताया जाता है कि मोदी सरकार द्वारा इसमें करवाये गए कतिपय संशोधनों के बाद अब यह बेहद प्रभावशाली हो चुका है। अब इसकी आड़ लेकर सिस्टम को चूना लगाना लगभग मुश्किल भरा कार्य हो चुका है।