बालू से पिंडदान क्यों किया जाता है? वाल्मीकि रामायण में मिलता है इसका उल्लेख



हिन्दू धर्म के अनुसार पितरों की तृप्ति और उनकी आत्मा की शांति के लिए हर साल पितृ पक्ष में श्राद्ध किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध के जरिए दिवंगत पूर्वजों को पिंड दान और तर्पण किया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष भाद्रपद की पूर्णिमा तिथि से शुरू होकर आश्विन माह की सर्वपितृ अमावस्या तक चलता है। आमतौर पर पितृ पक्ष 16 दिनों का होता है। इस साल पितृ पक्ष 20 सितंबर से प्रारम्भ हो रहा है और 06 अक्टूबर को समाप्त होगा। हिंदू धर्म में गया में बालू से पिंडदान करने का विशेष महत्व है। कई बार हमारे मन में विचार आता है कि आखिर पितरों को बालू से पिंडदान क्यों किया जाता है। आज के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि बालू से पिंडदान क्यों किया जाता है-

पिंडदान क्या होता है?

अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए किया जाने वाला दान ही पिंडदान है। पिंड का मतलब होता है गोल। पिंड दान में आटे से बने गोल पिंड का दान किया जाता है इसलिए इसे पिंड दान कहा जाता है। पिंड दान में चावल, गाय के दूध, घी, शक्कर और शहद को मिलाकर तैयार किए गए पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ पितरों को अर्पित किया जाता है।

बालू से पिंडदान क्यों किया जाता है?  

वाल्मिकी रामायण के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम, भगवान लक्ष्मण और माता सीता के साथ पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे थे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए राम और लक्ष्मण नगर की ओर चले गए तभी आकाशवाणी हुई कि पिंडदान का समय निकला जा रहा है। तभी माता सीता को महाराज दशरथ की आत्मा के दर्शन हुए जो उनसे पिंडदान की मांग कर रही थी। तब माता सीता ने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया। इससे राजा दशरथ की आत्मा ने प्रसन्न होकर माता सीता को आशीर्वाद दिया। माना जाता है कि तब से पितृपक्ष में बालू से पिंडदान करने की परंपरा चली आ रही है।