सजग रहकर बच सकते हैं वायुजनित इन बीमारियों से


ध्यान रखने की बात यह है कि अधिकतर संक्रमण श्वसनमार्ग से ही होते हैं...

लखनऊ। कोरोना महामारी से लोगों में सेहत के प्रति जागरूकता काफी बढ़ गई है। वयस्क हों या बुजुर्ग सभी की आदतों में बड़ा बदलाव दिख रहा है। खासकर, कोमर्बिडिटी ग्रुप के मरीजों में दूसरी बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए हेल्थ मानीटरिंग का चलन तेजी से बढ़ा है। वास्तव में लोगों के जीवन में आई यह सजगता स्वस्थ भारत के निर्माण की बुनियाद बन रही है। ऐसी ही सकारात्मक पहल के जरिए एक बड़ी आबादी को कई वायुजनित बीमारियों से बचाया जा सकता है। इनमें ज्यादातर रोगों का माध्यम यानी रास्ता एक ही है, वह है व्यक्ति का श्वसन मार्ग। इसलिए सावधानी बरतकर वायुजनित रोगों से हर साल लाखों लोगों की मौत को टाला जा सकता है।

क्या है वायुजनित रोग: वायुजनित (एयर बार्न डिजीज) बीमारियां पीड़ित व्यक्ति के खांसने, छींकने से फैलती हैं। इस दौरान व्यक्ति की नाक या मुंह से जो ड्रापलेट्स निकलते हैं, उनमें मौजूद वायरस व बैक्टीरिया काफी देर तक वातावरण में सक्रिय रहते हैं। इनके संपर्क में आने पर दूसरा व्यक्ति बीमारी की चपेट में आ जाता है। चिकित्सकीय भाषा में बात करें तो ये एक वायरल, बैक्टीरियल और फंगल इंफेक्शन डिजीज हैं। वायुजनित रोग फेफड़ों समेत शरीर के कई अंगों को प्रभावित करते हैं।

प्रमुख बीमारियां:

  • कोविड-19
  • ट्यूबरकुलोसिस
  • एंथ्रेक्स
  • एस्परगिलोसिस
  • चिकन पाक्स
  • स्माल पाक्स
  • स्वाइन फ्लू
  • राइनो वायरस
  • निमोनिया
  • सार्स

टीबी ले रहा लाखों लोगों की जान: कोरोना वायरस के कारण बड़ी तादाद में लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इसीलिए वायरस से बचाव के तमाम प्रोटोकाल बन गए हैं, जिन्हें हर एक के लिए मान्य कर दिया गया है। इसका परिणाम है कि हम बीमारी के खिलाफ जंग जीतने के करीब पहुंच रहे हैं। वहीं यदि ऐसी ही सतर्कता दूसरी वायुजनित बीमारियों के लिए बरती जाए तो बड़ी आबादी की जान बचाई जा सकती है।

भारत की ही बात करें तो 2019 से 2022 तक कोरोना से पांच लाख के करीब मौतें हुई हैं। वहीं वायुजनित रोगों में सिर्फ टीबी की बात करें तो यहां हर साल करीब चार लाख लोग टीबी से जान गंवा देते हैं। यदि दूसरी बीमारियों से होने वाली मौतों को शामिल किया जाए तो आंकड़ा और बढ़ जाएगा। कोराना संक्रमण के कारण लोगों में आई जागरूकता द्वारा दूसरी बीमारियों से भी जंग जीती जा सकती है। इसके लिए लोगों को लगातार सजग रहने की जरूरत है।

अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की हो कड़ी निगरानी: बाहर का ही नहीं अस्पतालों का संक्रमण भी चुनौती बना हुआ है। देश के सरकारी व निजी अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की मानीटरिंग की जाए। आईसीयू में पहुंचने वाले तमाम मरीज भर्ती के दौरान हास्पिटल एक्वायर्ड इंफेक्शन की चपेट में आ जाते हैं। इससे न सिर्फ मरीज के इलाज का खर्च बढ़ जाता है, बल्कि कई की जान भी चली जाती है।

सुपर इंफेक्शन ले रहा जान: बीमारी से जूझ रहे मरीज सेकंडरी इंफेक्शन की चपेट में आ रहे हैं। वे एकाएक बैक्टीरिया व फंगस की गिरफ्त में आ जाते हैं। अंदर ही अंदर उनका पूरा शरीर संक्रमण की चपेट में आ जाता है। ऐसे में कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों के लिए यह जानलेवा साबित हो जाता है। इसे ‘सुपर इंफेक्शन’ भी कहते हैं। सुपर इंफेक्शन की वजह से मरीज शाक में जाने के साथ-साथ मल्टी आर्गन फेलियर के शिकार भी हो जाते हैं। ऐसे में आइसीयू में भर्ती मरीजों का समय-समय पर ब्लड मार्कर व कल्चर टेस्ट आवश्यक है।

उपकरणों से मरीज में पहुंच रहे बैक्टीरिया: मरीजों में ई-कोलाई, क्लेबसिएला, स्टैफीलोकोक्स, स्युडोमोनाज, एसीनेटो बैक्टर बैक्टीरिया घातक बन रहे हैं। वहीं केंडिडा फंगस भी जानलेवा बन रहा है। इनसे मरीज का शरीर सेप्टीसीमिया का शिकार हो रहा है। ऐसे में जहां मरीज भर्ती हैं, वह हास्पिटल, डिवाइस, वेंटीलेटर, उपकरण, हेल्थ वर्कर व मरीज में हाईजीन को बनाए रखना बेहद आवश्यक है।

कैसे बचें संक्रमण से

  • मरीज से शारीरिक दूरी बनाए रखें
  • बाहर निकलने पर मास्क लगाएं
  • घर में वेंटिलेशन व्यवस्था ठीक रखें
  • हाथों व घर की साफ-सफाई का ध्यान रखें
  • घर की दीवारों में नमी से फंगस न पनपने दें
  • घर ऐसा हो जिसके अंदर कुछ देर के लिए धूप जरूर आए
  • इम्युनिटी दुरुस्त रखें
  • योग व व्यायाम करें
  • बीमार लोग चिकित्सक के परामर्श पर दवा का सेवन नियमित करें
  • मिट्टी और खाद का काम करते समय जूते, ग्लव्स पहनें रहें

ये बैक्टीरिया भी हैं घातक

एलीजाबेथकिंगी एनाफिलिज: इस बैक्टीरिया से नवजात निमोनिया की चपेट में आ रहे हैं। दिमागी बुखार का कारण भी यह बैक्टीरिया है।

स्ट्रेप्टोकाकस-ए गैल्कटी: यह बैक्टीरिया मां से जन्म लेने वाले शिशु को होता है। इसकी चपेट में शिशु को दिमागी बुखार हो जाता है।

स्ट्रेप्टोकाकस पायोजीन: यह एक प्रकार का खतरनाक फंगस है, जो त्वचा को नुकसान पहुंचाता है। समय पर पहचान न होने से मरीज के हाथ-पैर में सड़न पैदा हो जाती है और मरीज का पूरा शरीर संक्रमण की जद में आ जाता है। इसमें मरीज की जान तक जा सकती है।

कैंडिडा यूटिलिस: खुले घाव से यह फंगस फैलता है, जो खून में संक्रमण पैदा करता है। समय पर सटीक एंटीफंगल दवा न मिलने से जान जोखिम में पड़ सकती है।

सियूडोमोनास स्टूडजेरी: आइसीयू में भर्ती मरीजों को यह बैक्टीरिया संक्रिमत करता है। शरीर में इसका संक्रमण घाव के माध्यम से होता है।