जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां हो रही गंभीर, नहीं निकला हल तो जानें कैसे बढ़ता जाएगा खतरा
अमेरिका की अपनी तरह की पहली नैशनल इंटेलिजेंस इस्टीमेट रिपोर्ट में भारत को पाकिस्तान और अफगानिस्तान समेत उन 11 देशों में शामिल किया गया है, जो जलवायु परिवर्तन के लिहाज से चिंताजनक श्रेणी में माने गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये ऐसे देश हैं, जो जलवायु परिवर्तन के कारण सामने आने वाली पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों से निपटने की क्षमता के लिहाज से खासे कमजोर हैं। संयोग कहिए कि यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब उत्तराखंड में लगातार बारिश के चलते बाढ़ और भूस्खलन के रूप में आई त्रासदी ने पूरे देश को सकते में डाल रखा है। जाहिर है, हमें इन चुनौतियों के मद्देनजर अपनी तैयारियों पर ज्यादा ध्यान देना होगा। वैश्विक संदर्भ में देखें तो रिपोर्ट की टाइमिंग इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि इसी महीने के आखिर में ग्लासगो में कॉप 26 क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस शुरू होने वाली है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आने वाले समय में ग्लोबल टेंपरेचर की दशा तय करने में चीन और भारत की अहम भूमिका रहने वाली है। आखिर चीन दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है। भारत भले चौथे नंबर पर है, लेकिन चीन के साथ जुड़ इसलिए जाता है क्योंकि इन दोनों ही देशों में उत्सर्जन की मात्रा साल-दर-साल बढ़ रही है। दूसरे और तीसरे स्थान पर मौजूद अमेरिका और यूरोपियन यूनियन (ईयू) अपना उत्सर्जन कम करते जा रहे हैं। हालांकि यह भी कोई छुपा तथ्य नहीं है कि भारत जैसे देशों के लिए उत्सर्जन कम करना आसान नहीं है। इसके लिए जिम्मेदार सबसे बड़ा कारक कोयले का बहुतायत में इस्तेमाल है, जिसे रातोरात कम करना संभव नहीं। एक तो इसके सारे विकल्प अपेक्षाकृत महंगे पड़ते हैं और दूसरी बात यह कि आज भी यह सेक्टर बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार दिए हुए है। ऐसे में कोई भी बदलाव धीरे-धीरे ही किया जा सकता है। इसके अलावा इन बदलावों के आर्थिक पहलू की भी अनदेखी नहीं की जा सकती।

रिपोर्ट में ठीक अनुमान लगाया गया है कि इन बदलावों का खर्च उठाने के सवाल पर विकासशील और विकसित देशों के बीच कूटनीतिक रस्साकशी जारी रहने वाली है। खासकर इसलिए भी कि विकसित देश पेरिस समझौते के अनुरूप 2020 से सालाना 100 अरब डॉलर जुटाने में नाकाम रहे हैं, जिससे विकासशील देशों के लिए एनडीसी (नैशनली डिटरमिन्ड कन्ट्रीब्यूशन) गोल यानी उत्सर्जन कम करने से जुड़ी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता पूरी करना मुश्किल हो रहा है। बहरहाल, विभिन्न देशों की जिम्मेदारियां तय करते हुए भी इस बात का ख्याल रखना जरूरी है कि पर्यावरण संबंधी चुनौतियां अब इस कदर गंभीर रूप ले चुकी हैं कि इन्हें पूरी तरह राष्ट्रीय नजरिये से देखना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है। इसके प्रभाव विश्वव्यापी हैं और दोष चाहे किसी भी देश के सिर पर डाला जाए इसका नुकसान पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा। इसलिए रस्साकशी में उलझने के बजाय सबका जोर आम राय से रास्ता निकालने पर ही होना चाहिए।